About Me

New Delhi, DELHI, India
अपने बारे में क्या कहूँ, एक अनसुलझी पहेली सी हूँ.कभी भीड़ में अकेलापन महसूस करती हूँ! तो कभी तन्हाइयों में भरी महफिल महसूस करती हूँ! कभी रोते रोते हँसती हूँ, तो कभी हंसते हंसते रो पडती हूँ. मैं खुश होती हूँ तो लगता है,सारी दुनिया खुश है,और जब दुखी होती हूँ तो सारी कायनात रोती दिखती है! क्या हूँ मैं, नहीं जानती,बस ऐसी ही हूँ मैं, एक भूलभुलैया.......

Thursday, September 27, 2012

अनजानी सी मैं

ये कैसी स्थिति हो गई है  मेरी 
                    जब हंसती हूँ तो 
आँसू निकल पड़ते हैं और 
                    जब रोती हूँ तो एक मुस्कान 
मेरे अधरों पर खिल उठती है,,,,,,,,,,
          क्या हूँ मैं
खुद  ही से अनजान 
          एक अनजानी सी मैं..........................

Tuesday, September 25, 2012


ठहराव

कौन है,,जो मेरे ठहरे हुए व्यक्तित्व को झंकार रहा है,,
                      कौन है जो ठहरे हुए पानी में कंकड़ी मार कर
मेरा अस्तित्व हिला रहा है..
       कौन है जो मेरे ठहरे हुए जीवन को
मनमौजी बनाने को विवश कर रहा है
                 कौन है,,,,,,,,,,,,,,,,
क्या वो तुम हो...........................
             अगर तुम हो तो
चले जाओ................
             मुझे ऐसे ही रहने दो
मुझे इसकी आदत हो चुकी है.................
         

Sunday, September 23, 2012

दर्द

मैं ,, 
  मैं एक दर्द हूँ ,,दर्द की  आवाज़ नही होती 
                  मैं क्यों कहूँ कि तुम बदल गए 
क्योंकि,,
            जो मैं कल थी  वो खुद ही मैं
आज वैसी नही हूँ....
           कल मैं हंगामा थी ,, आज दर्द की पनाह में 
गूंगी हो चुकी हूँ|
         ये जिन्दगी मेरे लिए  ख्वाब जैसी है 
जिसमे मैं नही हूँ !
              क्योंकि किसी ने मुझे आँखों में बसाया ही नही ,,
अब पूछते हो,, मैं  कौन हूँ 
             मैं एक ऐसा सवाल हूँ जिसका कोई 
जवाब ही नही है,,,,,,,,,,,,
               ये सूरज जरूर मुस्का के तसल्ली देता है
कहता है ------------------ 
       जलता हूँ मैं भी ,,अकेली तू ही नही है.........................
                                 मैं एक नाम हूँ 
सिर्फ एक नाम------------मिष्टी......................

भटकाव

ना जाने कितने सालों से ,एक ही रास्ते पे 
          चलती जा रही थी 
कई बार लोगों ने भटकाने की  कोशिश की
              पर मैं उसी रास्ते पर अडिगता से दम भर कर चलती रही 
कुछ नाराज़ भी हो गए,,तो कुछ खुश;
और मैं-------------------अपने में ही खोई रही 
कि  अचानक ,,एक हवा का झोंका 
     आया,, 
नही पता कहाँ चल दी,,
  उस हवा के झोंके की खुशबु के साथ,,
                     खोई -खोई चलती गई ,,
मुझे मालूम था कि बहक रही हूँ      
           मेरा खुदा मुझे गुमराह कर रहा था या 
जिन्दगी जो पतझर के समान हो गई थी 
                       उसमे फूल खिला रहा था 
नही जानती !!!!
          पर पांव थिरक रहे थे ,मचल रहे थे 
उस खुशबु के पीछे जाने को 
           और मैं चलते -२ रुक गई  
कहाँ जाऊँ,नही समझ पा रही 
वो खुशबु मुझे खींचती है अपनी और 
              उस खुशबु को नही छोड़ पा रही हूँ 
और ना ही कदमों को अपनी गली से बाहर 
                    जाने देना चाहती हूँ,,,,,,,,,,,,,,,,
कोई मुझे इस भव -सागर से बाहर निकालेगा 
            आ जाओ कोई तो -------------------------
कोई तो निकालो .......................  
नव
     मुझे सामने का समन्दर बहुत प्यारा लग रहा है
मैं जब इसमें खड़ी होती हूँ 
        बड़ा सुकून मिलता है |
और जो सुकून मुझे मिलता है
      वो मैं तुम्हें भी देती हूँ ,,फिर क्यों ?
उस समन्दर की गहराई से डर जाती हूँ !!!!!!!
          क्यों आगे ,और आगे नही जा पाती हूँ Happy Hug Day| Happy Hug Day Wishes | Happy Hug Day Greetings
पता है नव ,क्यों ?
         क्योंकि उस पार आप नही हैं...
इसलिए नव 
           मुझे इसी किनारे पर 
इतनी कसकर अपनी आगोश में ले लो 
       कि मैं समन्दर के सुकून को भूलकर 
सिर्फ और सिर्फ तुम में ही खो जाऊँ.......................
aug........6..............
       

जुदाई

जुदाई का अर्थ सिर्फ 
         शरीर  का बिछुडना ही नही होता,,
जुदाई मानसिक भी होती है  !
       यही वजह है कि
वह आदमी  को रह रहकर टीसती है     .................

Friday, August 3, 2012

कौन हो तुम,,प्रियतम

कौन हो तुम , 
           जो अचानक मेरी जिन्दगी में चले आए हो ,
मैने  बचपन से अभी तक तुम्हें नही देखा,,
         नही जाना,
फिर कैसे ,किस रूप में ,
             आ गए मेरे  जीवन में ,
जिसे जाना नही,पहचाना नही,अचानक से 
                 वो सबसे प्यारा हो गया !
                          अब कोई रिश्ता तुमसे बदकर नही रहा,,
तुमने तो मेरे अगले सात जन्मो पर 
             कब्जा कर लिया,,
कोन हो तुम,मेरे जिन्दगी के मालिक
         या मेरी जिन्दगी!!!!!!!!!!!!!
क्यों एक मिलन के बाद 
              सब तरफ तुम ही तुम दीखते हो,,
सबके चेहरे में तुम्हारा ही चेहरा नज़र आता है
                       क्यों तुम्हारे एक स्पर्श के बाद 
नही समझ पाती ,कि कब मैं तुम्हारे साथ नही हूँ,,
                जिस आइने के सामने से हटती नही थी 
उसी के सामने क्यों लजा जाती हूँ !!!!!!!!!!!
              क्यों नही समझ पाती 
कि ये तुम हो--------या मैं
          कौन हो तुम ,जिसने मेरे स्वरूप का 
यूँ हरन कर लिया है,,,,,,,,,,,कौन हो तुम 
                 2 aug.12...........

     
              

Saturday, May 19, 2012

चलते चलते

अरे,
   तुम भी चल दिए,मुझे छोड़ के
अभी तो बाकि है मेरी चिता में अंगारे
            फिर तुम कहाँ चल दिए
तुम तो जानते हो ना,मैं अँधेरे से डरती हूँ,
         पर अब नही डरूंगी,तुम्हें तंग नही करूंगी
तुम जाओ प्रियतम
       मैने अंधकार में भी
तुम्हारी आकृति  अपनी चिता के धुंए से बना ली है
इसीलिए शांत लेटी हुई हूँ.

आज तुम्हारी गरमाई महसूस नही हो रही
      शायद इसीलिए
चिता भी ठंडी लग रही है
        पर क्या आज तुम्हें मेरा आगोश
मेरी गर्माई नही चाहिये
       शायद इसीलिए तुम भी चल दिए.
सुनों,आप बार बार आँखे पोंछ रहे थे
     मुझे अच्छा नही लगा
मैं अपना वचन नही निभा पाई
           मैने आपको रुला दिया
मैने आपका साथ बीच में ही छोड़ दिया
       हमने साथ में बहुत कम वक्त बिताया
वैसे तो हर जगह मैं ज़िद करके
      आपको अपने साथ लेके जाती थी
पर यहाँ,
         मुझे माफ़ करना मेरे प्रियतम
मैं यहाँ तुम्हें अपने साथ नही ले जा सकती
           तुम्हारे ज़िद करने के वाबजूद,
क्योंकि,
       घर पर हमारे प्यार की निशानियां
सुबक रही हैं,
अलविदा नही कहूंगी
क्योंकि
       तुम्हारी धडकनों में
सिर्फ और सिर्फ मैं ही धडकती हूँ
             और मैं मरना नही चाहती
इसलिए अलविदा नही कहूंगी,पति
        कभी नही कहूंगी,
तुम्हारी सांसों में,धड़कन में
        जीती रहूंगी,
जब तक तुम दुबारा से मेरी मांग  भरने नहीं आओगे......

Tuesday, April 24, 2012

बदलते रिश्ते 



बहुत मान था मुझे आपके ऊपर
मैने आपको क्या क्या बना रखा था 
            रोती थी,परेशान होती थी 
तो अपनी आंखों में आपकी मूरत बसा कर
     घंटों आपसे सबकी शिकायत करती थी.
तकिये को आप बना कर 
       अपने सारे आँसू उड़ेल देती थी.
तकिया जब ज्यादा गीला हो जाता 
     तो समझती कि आपका कुरता गीला हो गया 
उसे सुखाती,सहलाती.
    फिर चैन से लिपट कर सो जाती.
आपके इतना अनदेखा करने के बावज़ूद 
      एक अलग छवि दिल में बसा रखी थी 
अगर आपके लिए कोई कुछ कहे 
            तो दिल रोता था,लड़ पडती सबसे 
लेकिन अब ,जब मैं तुमसे बहुत दूर 
      जा ही रही थी,तब तो कम से कम 
मुझे लड़िया देते,
            चलते समय का 
आप ही के सामने 
आपकी प्रियतमा का दिया तोहफा 
मैं नही बर्दास्त कर पा रही हूँ 
      सब खत्म हो गया
 तुम्हें  आँसूओं के सहारे 
        अपनी नज़रों से गिरा रही हूँ 
     मैने भी अपने प्रिये का सहारा लिया 
मैं उसके कांधे पर सर रखकर रोई,
ताकि जिन् आंसुओं के जरिए
      तुम मेरी नजरों से गिरो 
तो कोई चोट न लगे.
   मेरे सारे आँसू मेरे प्रिय के कांधे से लुडक कर 
           सीधे उनके दिल तक पहुंचे,
अपनी तरफ से तुम्हें धूल में नही मिलने दिया 
      क्योंकि अब जब मेरी नजरों से तुम गिर गए 
तब भी आपका अपमान 
        बर्दास्त नही कर पाऊँगी.....